खुश रहना भी एक कला

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अपने कार्यालय से लौटते वक्त मुखानी चौराहे के जाम से वास्ता पड़ गया, कुछ फलांग आगे एक कोचिंग सेंटर के बाहर 15 से 18 साल के 6 लड़के खड़े थे, एक लड़का कंधे पर बैग उठाये लड़को की ओर चला आ रहा था, उस लड़के की बहुत बड़ी खासियत जो मुझे भायी.. एक एक लड़के के गले मिलना! दूसरे कोई भी लड़के आगे नही बढ़े…
खुद हंसते हुए आगे आता है और सबको गले लगाता है, सब लड़को के चेहरे खिल जाते है और खूब जोर जोर से हँसकर बातें करते हुए आगे बढ़ जाते है। उस खास लड़के की पहल छोटी सी थी, पर उसने अपनी खुशी का जो भाव सब बच्चों में बांटा वो असाधारण थी।
आज के डिजिटल युग में किसी को किसी से बात करने की फुर्सत भी नही है या यूं कहें कि फेसबुक, व्हाट्सएप्, इंस्टाग्राम इत्यादि.. आवाज भी छीनने की फ़िराक में है, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगीँ
उस प्यारे से बच्चे की अनुकरणीय पहल आने वाली पीढ़ी के लिए उम्मीद जगाती है कि भविष्य की पीढ़ी में सामाजिकता के स्वस्थ बीज अंकुरित होंगे।
प्रेमभाव की कोई कीमत नहीं होती और यही बेशकीमती भाव खुद को, समाज को खुशहाली जरूर देता है ।

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