खुश रहना भी एक कला

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खुश रहना भी एक कला है इस कला में माहिर कम ही लोग होते है और जो होते है, वे असामान्य लोग होते है।जिनकी आदतें और व्यवहार आम आदमियों जैसा नही होता।वे दिखावे से न प्रभावित होते है और न ही किसी की नकल करते है, वे जैसे होते है वैसे ही हर तरफ होते है।

आज हर कोई खुश रहना चाहता है और खुशी किसे नही पसंद।इस खुशी को पाने के लिए खुद का सरल होना ही जरुरी होता है, पर यही छोटी सी सरल होने वाली बात सबको कठिन टास्क लगता है। हमें ये मालूम होना चाहिए कि
जिंदगी छोटी-छोटी आवश्यकताओं के साये में पलकर ही बड़ी होती है।जिंदगी संतुलन चाहती है। और वह संतुलन एक संतुलित व्यक्ति ही कर सकता है। संतुलित व्यक्तियों का मिलना आज इसीलिए भी मुश्किल हो गया है,कि देखा देखी लोग बेवजह भागे जा रहे हैं।
कहाँ और किधर, कोई खबर नही है।एक कि परछाई के पीछे सभी छुपते से चले जा रहे हैं।

आज के इस मशीनी जीवन में जिसकी आवश्यकताएं सीमित है,वही खुश है और जिनकी विकराल है वो सबसे ज्यादा दुःखी और बाजारीकरण का गुलाम है। सन्तुष्टि सुख सुविधा से आने वाली वस्तु होती तो तनावग्रस्त लोगों की संख्या नगण्य होती।

एक तनावग्रस्त व्यक्ति कई लोगों को प्रभावित कर सकता है। एक खुशमिजाज व्यक्ति नाममात्र को ही प्रभावित कर पाता है। खुशमिजाज व्यक्ति के ऊपर न जाने कितने तोहमत भी लगते रहते है। शंकित नजरें भी सवालों की बीजें अपने हृदय में रोपित कर, अरे! इसकी कौन सी लॉटरी लग गयी ?

किसके साथ चक्कर चल रहा है इसका
कौन लड़की पट गयी या कौन कमबख्त को ये पंसद आ गयी।
इतने उलूल जुलूल सोच रखने वाले तनाव से कहाँ बच पाएंगे।तनाव से आजादी के रास्ते भी छोटे ही होते है,जहाँ धन का अपव्यय नही होता। अच्छा सोच एवं व्यवहार को बनाये रखना बड़ा आसान है।अपने से बड़ों का मान और सम्मान जिस हृदय से करते है वही हृदय आपका भी बन जाता है।
सरल हृदय चाहिए या अहंकारी ये आप लोगों को ही तय करना होगा।
खुश रहने के लिए माया मोह और लोभ से दूरी जरूरी है,कभी-कभी तो लगता है जैसे ईश्वर आस पास ही है और उसने अपने खेल को रुचिकर बनाने के लिए आदमियों को रिश्तों के माया जाल में उलझा रखा है ताकि इंसान अपना आपा खोता रहे और वो ऊपर से हँसता रहे साथ ही अपने होने के एहसास को दुनियावी में दिखा सके।
वाह री दुनिया,हम गोल- गोल घूमते रह जाते है।
खुश रहने का सारा ताम-झाम तो अपने भीतर ही आलस की चादर ताने सोयी रहती है।और हम है कि कस्तूरी मृग की तरह जीवन भर भटकते रहते है।
जिंदगी को अपने मन के भीतर की हरियाली आँगन में ही खेलने की आदत होनी चाहिए।
तो क्या ख्याल है !

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