बजट में देश की अर्थव्यवस्था में छायी मंदी से निपटने की कोई वास्तविक कार्ययोजना नहींः पांडेय

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हल्द्वानी। मोदी सरकार की केंद्रीय वित्तमंत्री द्वारा संसद में पेश बजट देश की अर्थव्यवस्था में छायी मंदी से निपटने की कोई वास्तविक कार्ययोजना प्रस्तुत नहीं करता। रोजगार के अवसरों में वृद्धि करके आम जनता की क्रय शक्ति बढ़ाने से ही अर्थव्यवस्था में छायी मंदी दूर हो सकती है। परन्तु भारतीय अर्थव्यवस्था में छायी मंदी पर केंद्रीय बजट आंखें मूंदे हुए है। यह बात संसद में पेश केंद्रीय बजट पर तात्कालिक प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भाकपा (माले) के नैनीताल जिला सचिव डॉ कैलाश पाण्डेय ने कही।उन्होंने कहा कि विकास दर लगातार नीचे गिर रही है तमाम अग्रणी अर्थशास्त्री इस पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट पेश करते हुए दावा कर रही हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है और 2014-19 के दौरान औसत वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत से अधिक रही। इसलिए यह आंकड़ों का हेरफेर करके की गई गलतबयानी तो है ही साथ में यह मुसीबत सामने देखकर भी शुतुरमुर्ग की तरह रेत में मुंह छुपाने जैसी बात है। जबकि खुद सरकार के नीति आयोग ने रिपोर्ट जारी कर स्वीकार किया है कि 2018 से गरीबी, भुखमरी और असमानता बढ़ी है। उन्होंने कहा कि यह बजट में बड़े कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने के लिए निजीकरण की गाड़ी की रफ्तार को तेज करने के लिए जाना जाएगा। तमाम सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी इस बजट में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। एल आई सी के विनिवेश का फैसला तथाकथित राष्ट्रवादी सरकार का राष्ट्र की आर्थिक आजादी पर हमला है। एल आई सी देश की अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है।  एल आई सी तमाम जनकल्याणकारी योजनाएँ संचालित करता है। इस समय चालीस करोड़ पालिसीधारक एल आई सी के मालिक हैं । सरकार विनिवेश के माध्यम से एल आई सी को चंद पूंजीपतियों की जेब में डालना चाहती है। तेजस जैसी 150 और प्राइवेट ट्रेनों को चलाने की बात कहकर वित्तमंत्री ने आम लोगों की सवारी रेलवे के निजीकरण और किराया महंगा करने की प्रक्रिया तेज करने पर मुहर लगा दी है, जबकि सरकार इससे पूर्व रेलवे के प्राइवेटाइजेशन से इंकार करती रही है। यही हाल अन्य पब्लिक सेक्टरों बैंक, रक्षा, बीएसएनएल आदि का भी है।

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