नौ मार्च को होगा गोधूलि वेला में होली दहन

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10 मार्च को मनाया जाएगा रंगों का त्योहार होली

देहरादून। रंगों का त्योहार होली इस बार चैत कृष्ण प्रतिपदा गुरुवार 10 मार्च को मनेगी। इससे एक दिन पूर्व 9 मार्च को होलिका दहन होगा। होलिका दहन पर इस बार दुर्लभ संयोग बन रहे हैं। इन संयोगों के बनने से कई अनिष्ट दूर होंगे। होलिका दहन भद्रा के बाद ही करना शुभ है। ऐसा माना जाता है कि भद्रा में होलिका दहन नहीं किया जाता है। इस बार होलिका दहन अच्छे योग में दहन होने जा रही है। अक्सर होलिका वाले दिन दहन के समय भद्रा होने से बड़ी मुहूर्त में परेशानी रहती थी। परन्तु इस बार ऐसा नहीं हो रहा बल्कि इस बार भद्रा रहित, ध्वज एवं गज केसरी योग उस दिन रहेगा। ज्योतिषाचार्य डॉक्टर आचार्य सुशांत राज ने बताया कि सोमवार, पूर्णिमा तिथि, पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र, ध्वज योग एवं गजकेशरी योग उस समय होगा। इस बार 9 मार्च सोमवार को भद्रा दिन के 01:12 बजे समाप्त हो जाएगी। होलिका दहन गोधूलि बेला में इस वार प्रदोष काल सूर्यास्त शाम 06:22 बजे से 08:49 बजे तक श्रेष्ठ मुहुर्त है। इसी समय चर की चौघड़िया का समबेश भी रहेगा जो अति उत्तम है। ज्योतिषाचार्य ने कहा कि जनता सुखी रहेगी किसान के गेहूं, चना, मटर, सरसों आदि फसलों का उत्पादन अच्छा रहेगा। किसान व व्यपारी दोनों ही सुख महसूस करेंगे। जनता में अमन चैन रहेगा।
वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय लोगों का त्यौहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। रंगों का त्यौहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते हैं। दूसरे दिन, जिसे प्रमुखतः धुलेंडी व धुरड्डी, धुरखेल या धूलिवंदन इसके अन्य नाम हैं, लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं। एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं। राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है। राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। होली का त्यौहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका नाम से मनाया जाता था। वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव भी कहा गया है।
होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। अपने बल के दर्प में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है। प्रतीक रूप से यह भी माना जाता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है। प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था।

होली पर रखें ध्यान:
इंजन ऑयल या मोबिल ऑयल से बचें।
रासायनिक रंगों का प्रयोग न करें
गहरे पक्के रंगों के प्रयोग से बचें।
शराब व नशीले पदार्थों के सेवन से बचें।
कीचड़, गोबर फेंककर होली न मनाएं।
पानी से भरे गुब्बारे प्रयोग न करें।
पानी की होली खेलने से बचें और पानी की बचत करें।
होली पर यह करें
शरीर और बालों पर तेल व क्रीम का प्रयोग करें।
शरीर को ढककर रंग खेलें।
आंखों पर धूप का चश्मे लगाएं।
रंग छुड़ाने को गर्म पानी का प्रयोग करें।
चेहरे से गहरे रंग को छुड़ाने के लिए दही और बेसन का लेप लगाएं।
चेहरे और हाथों के लिए वैसलीन जैली का प्रयोग करें।
सिर को टोपी या रूमाल से ढककर रखें।
आंखों पर रंग पडऩे की स्थिति में उन्हें मसलें नहीं, पानी से धोएं।
दांतों पर डेंटल कैप का प्रयोग करें।
वसायुक्त भोजन ज्यादा न खाएं।
बाजार की बनी मिठाई खाने से बचें।
चेहरे को बार- बार न धोएं।
प्राकृतिक रंगों की पहचान

रंग को खरीदते वक्त ध्यान दे कि रंग में से किसी तरह के केमिकल तो नहीं है। रंग खरीदने के दौरान आप थोड़ा सा रंग लेकर पानी उसे पानी में घोल कर देखकर चेक करलें। यदि रंग पानी में नहीं घुलता तो इसका मतलब है कि उसमें केमिकल मिलाया गया है। रंग खरीदते वक्त देखें कि उसमें चमकदार कण तो नहीं है, क्योंकि नेचुरल रंग में चमक नहीं होती साथ ही यह डार्क शेड में नहीं मिलते। आप घर में ही आसानी से नेचुरल रंग बना सकते हैं। इसके लिए बेसन और हल्दी को मिलाकर पीला रंग तैयार कर सकते हैं। यह आपकी स्किन के लिए भी अच्छा होगा। गुड़हल के फूलों के सूखे पत्तों के पाउडर को आटे के साथ मिला कर लाल रंग तैयार करें।

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