फूल देई, छम्मा देई… दैणी द्वार,भर भकार!!!

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मित्रों, आज 14 मार्च को हम उत्तराखंडी फूलदेई का त्योहार मना रहे हैं। यह त्यौहार होली के तुरंत बाद आता है और हमारी लोक संस्कृति से जुड़ा हुआ पर्व है। उत्तराखंड अपनी लोक संस्कृति के लिए देश भर में जाना जाता है और अब तो विदेशों में भी हमारी संस्कृति अपना परचम लहरा रही है । यह संभव हुआ है संचार माध्यमों की बदौलत और साथ ही विदेश में प्रवास करने वाले उत्तराखन्डियों का इसमें बहुत बड़ा योगदान है।
उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है ऊंचे पर्वत, नदियां और जंगलों में खिलने वाले खूबसूरत फूल इसकी छटा को और भी निखार प्रदान करते हैं। बसंत ऋतु के अंतर्गत मुख्यतः दो माह फाल्गुन और चैत्र आते हैं। होली के साथ ही फाल्गुन का समापन और चैत्र का आरंभ हो गया है। इसे फूलों का महीना कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। चैत्र मास की संक्रांति को ही मनाया जाता है फूलदेई का त्यौहार। यह आज भी अपना बचपन याद दिलाता है । जब हम थाली में रंग बिरंगे फूल, चावल लेकर अपने घरों की देहरी पूजते थे और फिर अपनी टोली के साथ आसपास के घरों में भी जाते थे। आज भी मुख्यत: गांवों में यह त्यौहार बच्चों द्वारा बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। बच्चे आसपास के घरों में जाते हैं। देहरी पर फूल और चावल डालकर फूलदेई, छम्मा देई नामक लोकगीत गाते हैं और इन्हें बदले में गुड़, चावल ,पैसे या अन्य उपहार भेंट किये जाते हैं। इन चावल और गुड़ को घी में मिलाकर एक विशेष व्यंजन भी आज के दिन तैयार किया जाता है जिसे ‘सई ‘कहते हैं। ये त्यौहार जीवन में आनंद और उत्साह जगाते हैं । खासकर ग्रामीण परिवेश में जहां आज भी संचार साधनों की बहुत ज्यादा उपलब्धता नहीं है। हमारी लोक परंपरा यूं ही कायम रहे, अनवरत चलती रहे, फूलों के त्योहार फूलदेई की सभी को शुभकामनाएं और सफल आगामी हिंदू नववर्ष की कामना के साथ ……. अमृता पांडे

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