उत्तराखंड: कहने को दो राजधानी, स्थायी एक भी नहीं

खबर शेयर करें

हल्द्वानी। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि उत्तराखण्ड राज्य को बने हुए 19 वर्ष व्यतीत हो गये हैं। 9 नवम्बर 2000 को अस्तित्व में आए इस राज्य के पास कहने को तो अब दो अस्थायी राजधानी है। एक देहरादून जो 9 नवम्बर 2000 को राजधानी घोषित हुयी थी और दूसरी गैरसैंण जिसे 4 मार्च 2020 को त्रिवेंद्र रावत सरकार ने ग्रीष्म कालीन राजधानी घोषित किया है। गैरसैंण केवल चमोली जिले में स्थित एक शहर का नाम नही है बल्कि यह राज्य आंदोलन से जुडा हुआ वह नाम है जो राजधानी के तौर पर 60 के दशक में वीर चंद्र सिंह गढवाली के द्वारा आगे बढाया गया था। इतना ही नही जब पर्वतीय मूल के लोग पृथक उत्तराखण्ड राज्य के लिए सडको पर उतरकर शांतिपूर्ण आंदोलन चला रहे थे उस समय यह ऐलान कर दिया गया था कि राज्य चाहे कभी भी बने लेकिन राजधानी तो गैरसैंण ही होगी। भाजपा की तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने 9 नवम्बर 2000 को उत्तराखण्ड राज्य तो दिया लेकिन देहरादून अस्थायी राजधानी के रूप में एक झूंझने की तरह उत्तराखण्डवासियों को सौंप दी। जब देहरादून में विकास कार्यो के नाम पर करोडो रूपया खर्च किया जा रहा था कि तभी यह लगने लगा था कि जिस तरह हिमाचल की राजधानी शिमला अस्थायी रूप से प्रदान की गयी थी ठीक उसी तर्ज पर उत्तराखण्ड राज्य को देहरादून कहने के लिए अस्थायी राजधानी मिल चुका है जबकि सरकार बैकडोर से दून को स्थायी राजधानी मानकर चल रही है। जिन संगठनो ने पृथक राज्य के लिए संघर्ष किया वही संगठन यदा कदा स्थायी राजधानी गैरसैंण मनाने की मांग को लेकर आंदोलन का बिगुल बजाते रहे। सरकार भी उनके आंदोलन को नजर अंदाज करती रही। कभी किसी ने भी गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने के लिए उस तर्ज पर आंदोलन नही चलाया जिस तर्ज पर सोयी सरकार को जगाया जाता। नतीजा यह हुआ कि गैरसैंण सभी के लिए गैर बनकर रह गयी। यह केवल एक चुनावी मुद्दे के रूप में उपयोग में आने वाला साधन बन गयी। उत्तराखण्ड क्रांति दल जब चुनाव मैदान में उतरता तभी गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का आश्वासन देता। लेकिन उक्रांद कभी इस स्थिति में नही पहुंचा कि वह अपनी घोषणा को अमली जामा पहनाता। राज्य गठन से लेकर अब तक उक्रांद का राजनीतिक ग्राफ गिरता चला गया। हालात यह हुए की आज उक्रांद की झोली में विधायक तक नही है। गैरसैंण राजधानी बनाना किसी भी पार्टी के लिए मुमकिन नजर नही आता। कारण यह है कि पहाड कौन चढे? भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान त्रिवेंद्र सरकार ने 4 मार्च 2020 को गैरसैंण में आयोजित बजट सत्र के दौरान विपक्ष को सरकार घेरने का मौका न देते हुए एक जोर का झटका धीरे से देते हुए गैरसैंण को ग्रीष्म कालीन राजधानी घोषित कर दिया। भाजपा संगठन ने इसे जोरदार ढंग से कैश कराया। पूरे राज्य में सरकार को बधाई देने के होर्र्डिंग्स चस्पा कर दिए गए। वही गैरसैंण का मुद्दा हाथ से निकलते देख विपक्ष भी बचाव की मुद्रा में आ गया और कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने ऐलान कर दिया कि जब कांग्रेस सत्ता में आयेगी तो गैरसैंण को स्थायी राजधानी घोषित कर दिया जाएगा। जहां कांग्रेस ने गैरसैंण को सत्ता में आने के बाद स्थायी राजधानी घोषित करने का वायदा कर चुनावी मुद्दे को हवा दे दी है वहीं भाजपा भी अब धर्म संकट मंे पड गयी है। यदि त्रिवेंद्र सरकार विधानसभा चुनाव से पहले गैरसैंण को स्थायी राजधानी घोषित नही करती तो यह निश्चित है कि कांग्रेस पार्टी भाजपा के संकल्प पत्र की तरह गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का वायदा जरूर करेगी और यदि कांग्रेस ने ऐसा किया तो यह तय है कि कही गैरसैंण ही कांग्रेस को सत्ता में न ले आये। अब गैरसैंण स्थायी राजधानी बनती है या फिर ग्रीष्म कालीन राजधानी बनकर ही अपना समय व्यतीत करेगी यह तो आने वाला वक्त बतायेगा। फिलहाल यह कहा जा सकता है कि उत्तराखण्ड एक ऐसा राज्य है जिसके पास अस्थायी राजधानी तो दो-दो है लेकिन स्थायी के नाम पर एक भी नही। 19 सालो में राज्य के खाते में दो अस्थायी राजधानी आ चुकी है। समय अधिक बीता है जब 19 साल में दो राजधानी है तो स्थायी राजधानी कितने सालो बाद प्राप्त होगी यह देखने वाली बात है। कही ऐसा न हो कि देश के बडे मुद्दो की तरह गैरसैंण भी एक राजनीति का नाम बनकर न रह जाए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *